शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

कुमार विजय गुप्त की कविताएँ


कुमार विजय गुप्त 


दौड़ाये राजे रजवाड़ों ने
दौड़ाये सामंतों सुल्तानों ने
दौड़ाये साहूकारों जमींदारों ने 
और अभी भी दौड़ाये जा रहे घोड़े
हरेक ऋतुओं में दौड़ रहे घोड़े
हरेक दिशाओं में दौड़ रहे घोड़े
उनके थूथनों पे लगा है ताज़ा लहू
उनके खुरों में फंसी मासूम चीखें
रौंद रहे खेत-खलिहान
उजाड़ रहे बाग-बगीचे
झोपड़ियों तक को नहीं वख्श रहे
बेलगाम दौड़ रहे घोड़े
आकाश में देवतागण
छतों पे बुद्धिजीवीवृन्द
नाले के किनारे भीड़ भेंड़ दीन हीन
हाथभर की दूरी से गुजर रहे घोड़े
सर्द और निस्तब्ध रात
नालों टापों के उन्माद का सही वक्त
घोड़ों ने झोंक दी है सारी शक्ति
इधर दौड़ रहे घोड़े
उधर खुश हैं घुड़सवार
कि जहां तक दौड़ जायेंगे घोड़े
वे सारे होंगे उनके अपने
गोया यह धरती, घरती नहीं
उनका रेस ग्राउंड हो !


अच्छा हुआ
कि टपक पड़े तुम बापू की जीभ से 
और उपर-ही-ऊपर लोक लिया मैंने
अब खिलौना मात्र हो तुम
जिसकी चाभी है सिर्फ मेरे पास
तुम भले ही रहे होगे त्रेता के मर्यादा
फिलवक्त, कलियुग का रावण हूँ मैं
मैंने जान लिया है
अपनी पराजय के समस्त कारणों को
अब एक-एक कर वह सब आजमाऊंगा तुम पर
अव्वल कि अपनी नाभि के अमृत को पीकर
बना लिया है मैंने अपना ही क्लोन असंख्य
और सिद्धहस्त हो चुका हूँ सीखकर
जादू-मंतर और समस्त कपट कलायें
पलक झपकते ही बना सकता हूँ तुम्हे
महाभारत का पासा
फेंक सकता हूँ राजनीति की चौपड़ पर
जान लो कि मैं ही हूँ शकुनि इस युग का
हे सर्वशक्तिमान
 रह जाओगे अवाक्
जब बना दूँगा तुम्हे बीज नन्हा-सा
और बो दूंगा अयोध्या में;
बड़ी उपजाऊ है मिटटी वहाँ की
फैलोगे तुम बनकर वृक्ष छतनार
सुदूर प्रदेशों तक फूलो-फलोगे ;
जान लो कि मैं कृष्ण नहीं
कि कर्म करूं पर न रखूँ फल की इच्छा
हे अंतर्यामी
हे सर्वव्यापी
चलो घुमा लाऊं तुम्हे वहाँ तक
जहां हर चीज संभव है म्रेरे एक इशारे पर
यह है अयोध्या यह गोधरा यह गुजरात
यह भारत और यह रहा महाभारत !
ये देखो लाशों के पर्वत
खून की नदियां, आँसुओं के झील
यह सुनो चीत्कारों-विलापों के गीत-नाद
राजनीति के अट्टहासों की धुन
इस युग में
मुझसे नहीं जीत पाओगे तुम
क्योंकि मैं मार चुका हूँ
अपने सारे विभीषणों को
तुम्हारा लक्ष्मण मेरे तलुवे सहलाता है
दशरथ रच रहें है तुम्हारे अपहरण की साजिश
 भारत की आँखे गथीं हैं तुम्हारी राजगद्दी पर
तुम्हारी सीता प्यारी....बेचारी अबला नारी
और तुम्हारा परमभक्त हनुमान
कहाँ-कहाँ लगायेगा आग
गोकि, पूरे विश्व को बना दूँगा लंका
हे तुलसी के कण-कण के राम
तुम्हें इतनी जल्दी लेने नहीं दूँगा विश्राम
कि अभी तुम मेरे "कलच" में हो !


दूध है बिस्कुट है चॉकलेट है जलेबी है
इतनी स्वादभरी है बच्चों की दुनिया
माँ की ममता जैसी मीठी दुनिया 
फूल हैं तितलियाँ हैं पिल्ले हैं खिलौने हैं
इतनी मुलायम है बच्चों की दुनिया
खरगोश जैसी मखमली दुनिया
झुनझुना है पोपैया बाजा है सुग्गा है
इतनी सुरीली है बच्चों की दुनिया
किसी लोकधुन-सी सुरमई दुनिया
मोरपंख है रंगीन पेंसिलें हैं उगता सूरज है
इतनी रंगीन है बच्चों की दुनिया
इन्द्रधनुष जैसी आभा वाली दुनिया
इतनी उड़ानभरी है बच्चों की दुनिया
कि इसमें चिड़ियाँ हैं पतंगें हैं कागज़ के जहाज हैं
इतनी शरारतभरी है बच्चों की दुनिया
कि इसमें गेंद हैं गुब्बारे हैं गुड्डी-गुड्डे हैं गिल्ली-डंडे हैं
इतनी संबंधों भरी है बच्चों की दुनिया
कि इसमें बिल्ली मौसी है चंदा मामा हैं सूरज दादा हैं
और हैं दादी नानी की भालू-बंदरों वाली कहानियाँ
बच्चों की इस अदभुत दुनिया में
धरती भी है रेत भी है और हैं उनके नाजुक घरौंदे
मौसम भी है बरसात भी है और हैं कागज़ की नावें
बच्चों की इस निष्कलुष दुनिया का
अपना एक सहज आकाश भी है
जिनमें हैं उनके कौतुक सवालों जैसे असंख्य सितारे
बच्चों की इस स्वप्निल दुनिया से इतर
एक और भी दुनिया है इसी दुनिया में
उस दुनिया में भी गोरैये जैसे मासूम बच्चे हैं
पर वह दुनिया न शहद जैसी मीठी है
न रूई के फाहे जैसी मुलायम
बच्चों की उस दुनिया में
न संगीत है न रंग है न उड़ान है न रोमांच
न ही खट्टी-मीठी पप्पियां थपकियां लोरियां
जमीन-सी खुरदरी है बच्चों की वह दुनिया
कागज-सी निपट कोरी है बच्चों की वह दुनिया
बच्चों की उस दुनिया का मौसम नहीं बदलता है
रातें कुछ ज्यादा ही होती हैं दिन कुछ कम ही होता है
उस दुनिया के दिनों में होते हैं लकड़सूंघे
और रातों में
परियों को परेशान करनेवाले शैतान !
बच्चों को उठा ले जानेवाले भेडिये !!

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