शनिवार, 23 दिसंबर 2017

माधव कौशिक की कविताएँ

माधव कौशिक 

माधव कौशिक हमारे समय के महत्त्वपूर्ण कवि हैं| जितना सच यह है कि वे राष्ट्रीय स्तर पर एक ग़ज़लकार की हैशियत से जाने जाते हैं उससे भी बड़ा सच ये है कि वे एक सम्पूर्ण साहित्यकार के रूप में अपनी पहचान बना चुके हैं| कविता की कई विधाओं के साथ-साथ साहित्य के विविध विधाओं की जितनी सूक्ष्म अभिव्यक्ति इनकी रचनात्मकता में दिखाई देती है, अन्यत्र मिल पाना संयोग ही कहा जा सकता है| भाषाओँ का वैविध्य इनके यहाँ इस तरह मिलता है कि किसी एक विधा के ही बनकर रहें, कहीं से भी आभास नहीं हो पाता| जिस समय ये नवगीत लिख रहे होते हैं भाषा की नवता अपने सम्पूर्ण सौंदर्य के साथ वर्तमान होती है| समकालीन कविता में कहन की जो स्पष्टता इनमें है वह सहज ही मुग्ध करती है| ग़ज़ल में इनकी अभिव्यक्ति का तो कुछ कहना ही नहीं है| कहानी की जैसी कसावट इनके यहाँ वर्तमान है, जितनी विविधता के साथ, आश्चर्य होता है कि यह कवि है या फिर कथाकार| इन दिनों संस्मरणात्मक उपन्यास लिखने में व्यस्त हैं| 

माधव कौशिक समकालीन हिंदी कविता में सांस्कृतिक स्मिता से उपजे यथार्थ को लेकर चिंतित दिखाई देते हैं| आदर्श और यथार्थ के मध्य गुम हो रही मानवीयता की वर्तमानता को सुनिश्चित करना कवि अपना कर्तव्य समझता है| मानव-मूल्यों और मानवीय-संबंधों की गरिमा बरक़रार रहे इसके लिए शास्वत संवाद की भूमिका को बनाए रखना कवि आवश्यक समझता है| समझ के धरातल पर कवि एक विशेष प्रकार की जिम्मदारी लिए पदार्पण करता है तो इस जिम्मदारी से अनवरत संघर्ष की राह का ही चयन करना श्रेयस्कर समझता है| जुगाड़ और जुमले की प्रवृत्ति में विश्वास न करके श्रम की अनिवार्यता को चिह्नित करना कवि का उद्देश्य रहा है| यही वजह है कि इस कवि को न तो वाम खांचे में फिट करके देखा जा सकता है और न ही तो राष्ट्रवादी खांचे में| इसके लिए शास्वत खेमा ही सुरक्षित रखकर परख की जमीन तैयार करनी होती है और वह है मानवीय स्मिता और संघर्ष का खेमा| तो आइये कवि को पढ़ते हुए कविताई की उर्वर सृजन-प्रक्रिया का आनंद लें-                                                        -                                                           

पिछले कई दिनों से

पिछले कई दिनों से
सूरज उगा न कोई भोर हुई है
पिछले कई दिनों से
आँखें, खुद आँखों की चोर हुई हैं

पिछले कई दिनों से दिल में
जीने के ज़ज्बात नहीं हैं
पिछले कई दिनों से
दुनिया के अच्छे हालात नहीं हैं

पिछले कई दिनों से
फूलों का खिलना भी बन्द पड़ा है
पिछले कई दिनों से
दरिया, साहिल पर मायूस खड़ा है

पिछले कई दिनों से
जैसे कतरे में भी गहराई है
पिछले कई दिनों से
तेरी याद बहुत ज्यादा आई है |


पुश्तैनी घर

पुस्तैनी घर की दीवारें
सिर्फ ईंट, गारा, चूने से
नहीं बनी हैं
सब पुरखों का
खून-पसीना भी शामिल है

मेहनत-कड़ी मशक्कत
इनसे झाँक रही है
और पिता की फटी बिवाई जैसी गहरी
दीवारों की खुली दरारें
बता रही हैं
कितना कठिन वक्त गुजरा है
आसमान सर पर उतरा है

तब कहीं जाकर
शीश छिपाने लायक
यह छत बन पाई है |

पुश्तैनी घर की दीवारें
परछाई-सी साथ चलेंगी
अंधी अंधियारी रातों में
दीपक बनकर रोज जलेंगी |

पुश्तैनी घर की दीवारें
मन्दिर से ज्यादा प्यारी हैं
ऊँची-ऊँची सभी हवेली
पुश्तैनी घर से हारी हैं |

इश्तहारी मुजरिम

अखबारों में खबर छपी है
एक शख्स की
सख्त ज़रूरत है हाकिम को
उसने नंगा सच कह कर के
बड़ा भयंकर जुर्म किया है
जिसकी सज़ा / मौत से कमतर
हो नहीं सकती |

उस मुजरिम का हुलिया यह है
‘रंग गंदुमी मगर धुआंसा
खुशदिल चेहरा मगर रुआंसा
अछा ख़ासा पढ़ा-लिखा है
दुनिया भर की सभी जुबाने
आसानी से लिख सकता है
साफ-साफ कहने के फन में
माहिर भी है |

उसके पाँव जमीं पर बेशक
आँखें आसमान छूती हैं
एक अकेला
वही शख्स है जिसकी रीढ़ अभी तक
कोई जादू तोड़ नहीं पाया है |

जिसका सर
चन्दन की चौखट पर
जाकर भी नहीं झुका है |
जिसके होंठ
कदम बोसी करने वालों को
थू कहते हैं |
ऐसा शख्स कहीं मिल जाये
तो हाकिम को इत्तला देना |’
अखबारों में खबर छपी है
एक शख्स की / बहुत जरूरत
है हाकिम को |


हवा मुल्क की

हवा मुल्क की
राजनीति ने गंदी कर दी
पानी सूख गया आँखों का
धरती कब से सिसक रही है

सत्ता दुर्योधन-सी दम्भी
जनता बेबस पांचाली-सी
भरी सभा में
चीर-हरण की व्यथा झेलती
उंगली से ब्रह्माण्ड ठेलती

लथपथ, लहूलुहान अँधेरा
फ़ैल रहा है दिग्-दिगन्त में
सूर्या न्याय का अस्त हो रहा
अंधकार के बीज बो रहा |

आओ हम मरने से पहले
जीवन का यह सूत्र
हथेली पर रख दें भावी पीढ़ी के
‘देखो, दरबारों में जाना
मगर कभी मत शीश झुकाना
झुकी पीठ पर लाचारी का
कूबड़ ढोना ठीक नहीं है
होठों की बद्चलन हंसी की
खातिर रोना ठीक नहीं है |

शुक्रवार, 22 दिसंबर 2017

कुमार विजय गुप्त की कविताएँ


कुमार विजय गुप्त 


दौड़ाये राजे रजवाड़ों ने
दौड़ाये सामंतों सुल्तानों ने
दौड़ाये साहूकारों जमींदारों ने 
और अभी भी दौड़ाये जा रहे घोड़े
हरेक ऋतुओं में दौड़ रहे घोड़े
हरेक दिशाओं में दौड़ रहे घोड़े
उनके थूथनों पे लगा है ताज़ा लहू
उनके खुरों में फंसी मासूम चीखें
रौंद रहे खेत-खलिहान
उजाड़ रहे बाग-बगीचे
झोपड़ियों तक को नहीं वख्श रहे
बेलगाम दौड़ रहे घोड़े
आकाश में देवतागण
छतों पे बुद्धिजीवीवृन्द
नाले के किनारे भीड़ भेंड़ दीन हीन
हाथभर की दूरी से गुजर रहे घोड़े
सर्द और निस्तब्ध रात
नालों टापों के उन्माद का सही वक्त
घोड़ों ने झोंक दी है सारी शक्ति
इधर दौड़ रहे घोड़े
उधर खुश हैं घुड़सवार
कि जहां तक दौड़ जायेंगे घोड़े
वे सारे होंगे उनके अपने
गोया यह धरती, घरती नहीं
उनका रेस ग्राउंड हो !


अच्छा हुआ
कि टपक पड़े तुम बापू की जीभ से 
और उपर-ही-ऊपर लोक लिया मैंने
अब खिलौना मात्र हो तुम
जिसकी चाभी है सिर्फ मेरे पास
तुम भले ही रहे होगे त्रेता के मर्यादा
फिलवक्त, कलियुग का रावण हूँ मैं
मैंने जान लिया है
अपनी पराजय के समस्त कारणों को
अब एक-एक कर वह सब आजमाऊंगा तुम पर
अव्वल कि अपनी नाभि के अमृत को पीकर
बना लिया है मैंने अपना ही क्लोन असंख्य
और सिद्धहस्त हो चुका हूँ सीखकर
जादू-मंतर और समस्त कपट कलायें
पलक झपकते ही बना सकता हूँ तुम्हे
महाभारत का पासा
फेंक सकता हूँ राजनीति की चौपड़ पर
जान लो कि मैं ही हूँ शकुनि इस युग का
हे सर्वशक्तिमान
 रह जाओगे अवाक्
जब बना दूँगा तुम्हे बीज नन्हा-सा
और बो दूंगा अयोध्या में;
बड़ी उपजाऊ है मिटटी वहाँ की
फैलोगे तुम बनकर वृक्ष छतनार
सुदूर प्रदेशों तक फूलो-फलोगे ;
जान लो कि मैं कृष्ण नहीं
कि कर्म करूं पर न रखूँ फल की इच्छा
हे अंतर्यामी
हे सर्वव्यापी
चलो घुमा लाऊं तुम्हे वहाँ तक
जहां हर चीज संभव है म्रेरे एक इशारे पर
यह है अयोध्या यह गोधरा यह गुजरात
यह भारत और यह रहा महाभारत !
ये देखो लाशों के पर्वत
खून की नदियां, आँसुओं के झील
यह सुनो चीत्कारों-विलापों के गीत-नाद
राजनीति के अट्टहासों की धुन
इस युग में
मुझसे नहीं जीत पाओगे तुम
क्योंकि मैं मार चुका हूँ
अपने सारे विभीषणों को
तुम्हारा लक्ष्मण मेरे तलुवे सहलाता है
दशरथ रच रहें है तुम्हारे अपहरण की साजिश
 भारत की आँखे गथीं हैं तुम्हारी राजगद्दी पर
तुम्हारी सीता प्यारी....बेचारी अबला नारी
और तुम्हारा परमभक्त हनुमान
कहाँ-कहाँ लगायेगा आग
गोकि, पूरे विश्व को बना दूँगा लंका
हे तुलसी के कण-कण के राम
तुम्हें इतनी जल्दी लेने नहीं दूँगा विश्राम
कि अभी तुम मेरे "कलच" में हो !


दूध है बिस्कुट है चॉकलेट है जलेबी है
इतनी स्वादभरी है बच्चों की दुनिया
माँ की ममता जैसी मीठी दुनिया 
फूल हैं तितलियाँ हैं पिल्ले हैं खिलौने हैं
इतनी मुलायम है बच्चों की दुनिया
खरगोश जैसी मखमली दुनिया
झुनझुना है पोपैया बाजा है सुग्गा है
इतनी सुरीली है बच्चों की दुनिया
किसी लोकधुन-सी सुरमई दुनिया
मोरपंख है रंगीन पेंसिलें हैं उगता सूरज है
इतनी रंगीन है बच्चों की दुनिया
इन्द्रधनुष जैसी आभा वाली दुनिया
इतनी उड़ानभरी है बच्चों की दुनिया
कि इसमें चिड़ियाँ हैं पतंगें हैं कागज़ के जहाज हैं
इतनी शरारतभरी है बच्चों की दुनिया
कि इसमें गेंद हैं गुब्बारे हैं गुड्डी-गुड्डे हैं गिल्ली-डंडे हैं
इतनी संबंधों भरी है बच्चों की दुनिया
कि इसमें बिल्ली मौसी है चंदा मामा हैं सूरज दादा हैं
और हैं दादी नानी की भालू-बंदरों वाली कहानियाँ
बच्चों की इस अदभुत दुनिया में
धरती भी है रेत भी है और हैं उनके नाजुक घरौंदे
मौसम भी है बरसात भी है और हैं कागज़ की नावें
बच्चों की इस निष्कलुष दुनिया का
अपना एक सहज आकाश भी है
जिनमें हैं उनके कौतुक सवालों जैसे असंख्य सितारे
बच्चों की इस स्वप्निल दुनिया से इतर
एक और भी दुनिया है इसी दुनिया में
उस दुनिया में भी गोरैये जैसे मासूम बच्चे हैं
पर वह दुनिया न शहद जैसी मीठी है
न रूई के फाहे जैसी मुलायम
बच्चों की उस दुनिया में
न संगीत है न रंग है न उड़ान है न रोमांच
न ही खट्टी-मीठी पप्पियां थपकियां लोरियां
जमीन-सी खुरदरी है बच्चों की वह दुनिया
कागज-सी निपट कोरी है बच्चों की वह दुनिया
बच्चों की उस दुनिया का मौसम नहीं बदलता है
रातें कुछ ज्यादा ही होती हैं दिन कुछ कम ही होता है
उस दुनिया के दिनों में होते हैं लकड़सूंघे
और रातों में
परियों को परेशान करनेवाले शैतान !
बच्चों को उठा ले जानेवाले भेडिये !!

गुरुदेव कौ अंग (कबीर की साखी)

सतगुर सवाँन को सगा, सोधी सईं न दाति। हरिजी सवाँन को हितू, हरिजन सईं न जाति॥1॥ बलिहारी गुर आपणैं द्यौं हाड़ी कै बार। जिनि मानिष तैं देवता, क...